आपका समर्थन, हमारी शक्ति

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

दाम्पत्य प्रेम का उत्सव है करवा चौथ

करवा चौथ सुहागिनों का एक व्रत मात्र नहीं है, बल्कि दाम्पत्य प्रेम का उत्सव भी है। रिश्तों की डोर को मजबूत रखने का एहसास भी है। चौदहवीं का चाँद की खूबसूरती उपमा अपने यहाँ खूब दी जाती है, पर करवा चौथ के  चाँद की बात ही निराली होती है। इस दिन तो उनकी बड़ी मनुहार होती है और चाँद भी खूब लुका -छिपी खेलता है।  वैसे भी चाँद की शीतलता और मधुरता  का स्वभाव दाम्पत्य प्रेम के लिए जरुरी है। जीवन साथी को चाँद की उपमा दी जाती है और चांदनी को प्रेम की। ऐसे में करवा चौथ के साथ चाँद का तादात्म्य और भी गहरा हो जाता है। 
करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बहुत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।  करवा चौथ के दिन श्री गणेश, मां गौरी और चंद्रमा  का पूजन किया जाता है। पूजन करने के लिए बालू की वेदी बनाकर सभी देवों को स्थापित किया जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाये जाने वाले इस त्यौहार में सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। इस पर्व पर महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाकर, चूड़ी पहन व सोलह श्रृंगार कर अपने पति की पूजा कर व्रत का पारायण करती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4  बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। इस दिन पत्नियाँ निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं और रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देने के उपरांत ही अपना व्रत तोड़ती हैं। 

भारत देश में वैसे तो चौथ माता जी के कई  मंदिर स्थित है, लेकिन सबसे प्राचीन एवं सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है । चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया । चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी ।
करवा चौथ व्रत से कई  कहानियां जुडी हुई हैं। इनमें से सर्वप्रमुख एक साहूकार के सात बेटों और उनकी एक बहन करवा से जुडी हुई है। इस कहानी के अनुसार सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा कि उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल  है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। ऐसे में वह  व्याकुल होकर तड़प उठती  है। ऐसे में उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर  वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। 

करवा चौथ के व्रत का जिक्र महाभारत में भी मिलता है।  कहते हैं कि  जब पांडव वन-वन भटक रहे थे तो भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इस दिव्य व्रत के बारे बताया था।  इसी व्रत के प्रताप से द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी उम्र का वरदान पाया था। 

फिल्मों और धारावाहिकों ने करवा चौथ के व्रत को ग्लैमराइज रूप भी दिया है। कुछ ही  सिमित इस त्यौहार को इनके चलते देशव्यापी पहचान मिली है। करवाचौथ को लेकर तमाम बातें भी कही जाती हैं। मसलन, मात्र पत्नी द्वारा ही व्रत क्यों रखा जाये या मात्र व्रत रखने से भला कौन सी उम्र बढ़ती है ? सवाल उठने स्वाभाविक भी हैं और इनके तार्किक जवाब देना  मुश्किल भी है। अपने देश में व्रत और त्यौहारों की दीर्घ परंपरा रही है और यह भी उतना ही सच है कि अधिकतर त्यौहारों और व्रत का जिम्मा महिलाओं का ही होता है।  कुछ लोग इसे पितृ-सत्तात्मक सोच से जोड़कर देखते हैं, तो कुछेक का मानना  है कि पुरुषों में इतना संयम और धैर्य नहीं होता की वे इसे निभा सकें। खैर, तर्क-वितर्कों से परे तमाम परम्पराएँ आज भी समाज को जीवंत रूप देती हैं। आस्था उनका मूल तत्व है।   
वस्तुत : करवा चौथ के व्रत को फायदे-नुकसान या बाध्यता की  बजाय प्यार और समर्पण के नजरिये से देखने की जरूरत है। अपने रिश्तों में संजीदगी भी व्रत का जरुरी हिस्सा होता है। उम्र का बढ़ना या न बढ़ना अपने हाथ में तो नहीं है, लेकिन प्यार की उम्र जरूर बढ़ती है। सिर्फ पत्नियाँ ही नहीं बल्कि अब तो पति भी अपनी-अपनी तरह से प्यार का इज़हार करने में पीछे नहीं रहते। चाहे वो साथ में चाँद का इंतज़ार हो, छुट्टी लेकर पूरा दिन साथ में बिताना हो, उपहार देना हो या साथ में व्रत रखना हो। ऐसे में व्रत को केवल सिद्धांत रूप में देखना नाकाफ़ी होगा। यह व्रत पति-पत्नी में प्यार, सम्मान, विश्वास को मजबूत करते हुए रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है।  करवा चौथ के व्रत और पर्व को समग्रता में देखते हुए अपने वैवाहिक जीवन को और और सुदृढ़ करने की दोतरफ़ा कोशिश जरूर होनी चाहिए।

करवा चौथ का पर्व हर साल आता है और पूरे जोशो खरोश के साथ सेलिब्रेट किया जाता है। करवा चौथ  सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सन्देश भी छिपा हुआ है।  आज समाज में जब रिश्तों के मायने बदलते जा रहे हैं, भौतिकता की चकाचौंध में हमारे पर्व और त्यौहार भी उपभोक्तावादी संस्कृति तक सिमट गए हैं, ऐसे में करवा चौथ के मर्म और मूल को समझने की जरूरत है। 

करवा चौथ (करक चतुर्थी) अर्थात भारतीय नारी के समर्पण, शीलता, सहजता, त्याग, महानता एवं पतिपरायणता  को व्यक्त करता एक पर्व। दिन भर स्वयं भूखा प्यासा रहकर रात्रि को जब मांगने का अवसर आया तो अपने पति देव के मंगलमय, सुखमय और दीर्घायु जीवन की ही याचना करना यह नारी का त्याग और समर्पण नहीं  तो और क्या है ?

करवा चौथ का वास्तविक संदेश दिन भर भूखे रहना ही नहीं अपितु यह है नारी अपने पति की प्रसन्नता के लिए, सलामती के लिए इस हद तक जा सकती है कि पूरा दिन भूखी - प्यासी भी रह सकती है। करवा चौथ नारी के लिए एक व्रत है और पुरुष के लिए एक शर्त। शर्त केवल इतनी कि जो नारी आपके लिए इतना कष्ट सहती है उसे कष्ट न दिया जाए। जो नारी आपके लिए समर्पित है उसको और संतप्त न किया जाए। जो नारी प्राणों से बढ़कर आपका सम्मान करती है जीवन भर उसके सम्मान की रक्षा का प्रण आप भी लो। उसे उपहार नहीं आपका प्यार चाहिए !!   - आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

'डिजिटल इण्डिया' वाले भारत में सरकारी कार्यालय में स्मार्ट फोन पर बैन

डिजिटल इण्डिया वाले भारत में सरकारी कार्यालयों में स्मार्ट फोन पर प्रतिबन्ध की ख़बरें भी आने लगी हैं। राजस्थान के उदयपुर जिले के सिंचाई विभाग के ऑफिस में स्मार्ट फोन लाये तो अनुपस्थित माने जाएंगे और जुर्माना भी लगेगा ! एक तरफ़ डिजिटल इण्डिया की बात, दूसरी तरफ़ सरकारी योजनाओं को सोशल मीडिया के माध्यम से अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने का आह्वान....
स्कूल और कॉलेजों में स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध की खबरें आप ने अक्सर सुनी होगी, लेकिन क्या किसी सरकारी विभाग में कर्मचारियों के स्मार्टफोन पर बैन की खबरें सुनी है। दरअसल, राजस्थान के उदयपुर जिले के सिंचाई विभाग ने अपने कर्मचारियों को नोटिस जारी करके विभागीय परिसर के अंदर स्मार्टफोन का उपयोग करने पर रोक लगा दी है। यह आदेश मंगलवार 8 अगस्त, 2017  से प्रभावी होगा। आदेश के मुताबिक 8 अगस्त से अगर कोई कर्मचारी फोन इस्तेमाल करते हुए मिला तो उसकी उस दिन की उपस्थिति नहीं मानी जाएगी। यह आदेश जारी करने की वजह ऑफिस के सभी काम को सही तरह से संचालित करने के लिए लिया गया है।

न्यूज एजेंसी एएनआई ने विभाग की ओर से जारी आदेश की कॉपी शेयर की है। इसमें लिखा है- इस कार्यालय के सभी स्टाफ को आदेशित किया जाता है कि दिनांक 08/08/2017 से कार्यालय समय में एंड्रॉयड फोन, आईफोन और विंडोज फोन का उपयोग पूर्णतया वर्जित होगा। जिस किसी कर्मचारी के पास उपरोक्त फोन पाए जाते हैं तो उसको उस दिन कार्यालय से स्वैच्छा से अनुपस्थित मानते हुए अग्रिम कार्यवाही अमल में लाई जाएगी। यह नियम सिर्फ काम करने वालों पर नहीं बल्कि ऑफिस आने वाले आगंतुकों पर भी लागू होगा।

विजिटरों के लिए भी स्मार्टफोन यूज करने पर भी बैन लगाया गया है। कार्यालय में बाहर से आने वाले आगन्तुक को यह फोन ऑफिस एरिया से बाहर रखकर आने के लिए कहा गया है। परिसर में इस फोन का उपयोग करने पर 500 रुपए जुर्माने के तौर पर वसूलने का प्रावधान किया गया है। आगन्तुकों से लिया गया पैसा राजकीय कोष में जमा किया जाएगा। नोटिस में बताया गया है कि कार्यालय के कार्यों को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। साथ ही कर्मचारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि अगर बहुत जरुरी सूचना देनी है तो ऑफिस का फोन इस्तेमाल कर सकते हैं। यह आदेश जल संसाधन विभाग, उदयपुर के अधिशाषी अभियंता हेमंत कुमार की ओर से जारी किया गया है।

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

साहित्यकारों के नाम पर होंगे ट्रेनों के नाम

देश के साहित्यकारों को युवा पीढ़ी से जोड़ने और साहित्यकारों को ट्रेन के माध्यम से  देश भर में विस्तार देने हेतु रेलवे मंत्रालय ट्रेनों का नाम मशहूर साहित्यकारों के नाम पर रखने का विचार कर रहा है। इसमें न सिर्फ लेखक को, बल्कि वह जिस इलाके का है उसे भी तरजीह दी जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो, पश्चिम बंगाल  जाने वाली ट्रेन का नाम  महाश्वेता देवी तो  बिहार जाने वाली ट्रेन का नाम रामधारी सिंह दिनकर जैसी मशहूर साहित्यिक हस्तियों के नाम पर होगा।
 रेलवे देश भर की सैर कराती है,  ऐेसे में ट्रेन अलग-अलग संस्कृतियों का शोकेस हो सकती हैं। ऐसे में रेलवे अलग-अलग इलाकों और अलग-अलग भाषाओं से आने वाले लेखकों के नाम पर ट्रेनों का नाम करने पर विचार कर रहा है। इसके तहत साहित्य एकेडमी अवॉर्ड जीतने वालों के नाम छांटने के साथ ही इस काम की शुरुआत  की जा चुकी  है। इससे विभिन्न संस्कृतियों को लोगों को जानने के लिए मिलेगा।
गौरतलब है कि इससे पहले भी साहित्यिक कृतियों और साहित्यिक व्यक्तित्व के नाम पर कुछेक ट्रेनों के नाम रखे जा चुके हैं। कैफी आजमी के गृह नगर आजमगढ़ जाने वाली ट्रेन का नाम "कैफियत" एक्सप्रेस है तो मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कृति "गोदान" के नाम पर गोदान एक्सप्रेस संचालित हो रही है।

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

शिक्षक दिवस : देश-समाज के लिए प्रकाश स्तंभ की भांति हैं शिक्षक

शिक्षक दिवस पर सभी को बधाईयाँ। जिस विभूति के नाम पर यह दिवस मनाया जाता है, उन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था और उनके मत में शिक्षक होने का हकदार वही है, जो लोगों से अधिक बुद्धिमान व विनम्र हो। अच्छे अध्यापन के साथ-साथ शिक्षक का अपने छात्रों से व्यवहार व स्नेह उसे योग्य शिक्षक बनाता हैै। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है। उनका मानना था कि शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे। उनके यह शब्द समाज में शिक्षकों की सही भूमिका को दिखाते हैं- ’’शिक्षक का काम सिर्फ किताबी ज्ञान देना ही नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियों से छात्र को परिचित कराना भी होता है।’’ ..... आज जरूरत है उस भावना को आत्मसात करने की, तभी शिक्षक दिवस फलीभूत होगा !! -आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

शिक्षक  दिवस पर लेख : गुरु-शिष्य की बदलती परंपरा (आकांक्षा यादव)

शिक्षक  दिवस पर लेख : गुरु-शिष्य की बदलती परंपरा (आकांक्षा यादव)

शिक्षक  दिवस पर लेख : प्रकाश स्तंभ  हैं शिक्षक (आकांक्षा यादव)

शिक्षक  दिवस पर लेख : शिक्षकों की भूमिका व कर्तव्यों पर पुनर्विचार जरूरी  (आकांक्षा यादव)

शिक्षक  दिवस पर लेख :देश-समाज के लिए प्रकाश स्तंभ की भांति हैं शिक्षक (आकांक्षा यादव)

रविवार, 3 सितंबर 2017

इंदिरा गांधी के बाद पहली महिला रक्षामंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

देश की रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण। इंदिरा गांधी के बाद पहली महिला रक्षामंत्री बनीं निर्मला सीतारमण और स्वतंत्र रूप में देश की पहली महिला रक्षा मंत्री। गौरतलब है कि श्रीलंका में 1960 में श्रीमावो भंडारनायको को रक्षा मंत्रालय की कमान सौंप कर इसकी शुरुआत की गई, वहीं 1980 में प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी भी देश की रक्षा मंत्री रह चुकी है। इसके अलावा मौजूदा समय में फ्रांस, इटली, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया समेत 15 देशों में महिला रक्षा मंत्री मौजूद हैं।

जिस देश में महिलाओं की भूमिका को 'गृह' तक सीमित करके देखा जाता है, उनके पहनावे से लेकर बाहर निकलने तक पर बंदिशें थोपी जाती हैं ताकि वे सुरक्षित रहीं......ऐसे में वहाँ एक महिला देश की रक्षा की कमान संभालेगी, विदेश मंत्री के रूप में नारी-शक्ति का नेतृत्व पहले से ही है, देखकर अच्छा लगता है।  काश कि यह सोच समाज में भी निचले स्तर तक व्याप्त हो !!

सोमवार, 14 अगस्त 2017

"स्वतंत्रता दिवस" एवं "श्रीकृष्ण जन्माष्टमी" की हार्दिक शुभकामनाएँ

केसरिया बल भरने वाला, सादा है सच्चाई,
हरा रंग है हरी हमारी, धरती की अँगड़ाई।
और कहता है यह चक्र हमारा कदम कभी न रुकेगा, 
हिंद देश का प्यारा झंडा, ऊँचा सदा रहेगा !!

.........स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!
Happy Independence day.


देश की आजादी की एक और सालगिरह । स्वतंत्रता को आज व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है। स्वतंत्रता माने सिर्फ राजनैतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक और अन्तत: वैयक्तिक स्वतंत्रता भी है, जहाँ हर स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया में हम भागीदार हो सकें और सकारात्मक रूप में देश और समाज के लिए कुछ कर सकें। स्वतंत्रता अपने आप में संपूर्ण है। इसका शाब्दिक विश्लेषण करें तो यह स्व का तंत्र है, अर्थात स्वयं को पा लेना ...इस स्वतंत्रता दिवस पर आत्मविश्लेषण करके देखने की जरुरत है कि क्या हम अपनी चेतना को पूर्ण रूप में पा चुके हैं और सच्चे अर्थों में वाकई स्वतंत्र हैं ..स्वतंत्रता दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं..!! 

(चित्र में : 
बेटी अपूर्वा तिरंगे के साथ, जिसे उसने अपनी दीदी अक्षिता के साथ मिलकर बनाया और कलर किया है)
श्रीकृष्ण सिर्फ एक भगवान या अवतार भर नहीं थे।  इन सबसे आगे वह एक ऐसे पथ-प्रदर्शक और मार्गदर्शक थे, जिनकी सार्थकता  हर युग में बनी रहेगी।  उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया।  श्रीकृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। यही कारण है कि भगवान श्री कृष्ण की स्तुति लगभग सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में की जाती है। यहाँ तक कि वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, वे भी निश्चित रूप से भगवदगीता से प्रभावित हैं।  श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहे गए उपदेशों का हर एक वाक्य हमें कर्म करने और जीने की कला सिखाता है। अब तो कॉरपोरेट जगत भी मैनेजमेंट के सिद्धांतों को गीता से जोड़कर प्रतिपादित कर रहा है।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ !!



"स्वतंत्रता दिवस" एवं  "श्रीकृष्ण जन्माष्टमी" के शुभ पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ !!
Happy Independence day & Happy Krishna Janmashtami.

रविवार, 23 जुलाई 2017

आकांक्षा यादव को 'रचना प्रतिभा सम्मान' व 'शतकवीर सम्मान', मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच ने जोधपुर में किया सम्मानित

साहित्यकारों, लेखकों, कवियों या तमाम विधाओं के रचनाकारों से उनका बायोडाटा मंगाकर उन्हें सम्मानित करने की बहुत पुरानी परम्परा रही है। परन्तु, यदि कोई आपसे यह कहे कि आपकी रचनाओं को बिना आपका नाम बताये देश के तमाम शहरों में सुनाया गया और श्रोताओं ने उन्हें पसंद कर कार्ड दिए तो सुनकर अच्छा लगता है। ऐसा ही अनूठा प्रयास देश भर में मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम), भारत वर्ष  द्वारा किया जा रहा है, जिसे कि स्थापित मंचीय कवियों के समानांतर एक नई सोच खड़ी करने के लिए सराहा जा रहा है। 
पिछले दिनों मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम) के राष्ट्रीय संयोजक श्री सुधीर सिंह सुधाकर ने सूचित किया कि देश भर में हमारी रचनाओं के पाठ के दौरान श्रोताओं द्वारा एक हजार से ज्यादा ग्रीन कार्ड मिले हैं और कई रचनाओं को तो एक ही दिन में सौ से ज्यादा ग्रीन कार्ड मिले हैं। इसी आधार पर मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम) द्वारा हमें 7 जुलाई, 2017 को जोधपुर के होटल चंद्रा इन में आयोजित समारोह  में ''रचना प्रतिभा सम्मान'' और ''शतकवीर सम्मान'' से सम्मानित किये जाने का निर्णय लिया गया है। खैर, अपनी अस्वस्थता के चलते हमारा यह  सम्मान पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव जी ने  ग्रहण किया।

 कृष्ण कुमार यादव जी को भी देश भर में उनकी रचनाओं के पाठ के दौरान श्रोताओं द्वारा श्रेष्ठता आधार पर, ''रचना स्वर्ण प्रतिभा सम्मान'', और ''शतकवीर सम्मान'' से सम्मानित किया गया। इस सद्भावना के लिए मगसम का आभार! 

यह सम्मान कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि-कथाकार श्री रविदत्त मोहता, वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरिदास व्यास, सेवानिवृत्त न्यायधीश श्री मुरलीधर वैष्णव और मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच के राष्ट्रीय संयोजक श्री सुधीर सिंह सुधाकर ने प्रदान किये। सम्मान स्वरुप  श्रीफल, शाल, प्रशस्ति-पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। रचना का कद रचनाकार से सदैव बड़ा होता है, ऐसे में अपनी रचनाओं को सम्मानित किये जाने से हम अभिभूत हैं । 

मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम) के राष्ट्रीय संयोजक श्री सुधीर सिंह सुधाकर ने बताया कि  मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच संस्था देश भर के विभिन्न शहरों में रचनाकारों की रचनाओं का पाठ करवाती है और इस दौरान श्रोताओं द्वारा रचना को हरा, पीला और लाल कार्ड देकर वोट किया जाता है। एक ही दिन में 1,00 से अधिक ग्रीन वोट पाने वाले रचनाकारों को 'शतकवीर सम्मान' से सम्मानित किया जाता है। इसके अलावा क्रमश: 1,000, 2000, 3,000 और 5,000  से अधिक ग्रीन (श्रेष्ठ) वोट पाने वाले रचनाकारों को क्रमशः  'रचना प्रतिभा सम्मान',  'रचना रजत प्रतिभा सम्मान',  'रचना स्वर्ण प्रतिभा सम्मान' और 'लाल बहादुर शास्त्री साहित्य रत्न सम्मान' से उन्हीं के शहर में जाकर सम्मानित किया जाता है।  
इसी क्रम में जोधपुर से 20 रचनाकारों को सम्मानित किया गया।  इनमें राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं एवं चर्चित साहित्यकार  व् ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव को 'रचना स्वर्ण प्रतिभा सम्मान', सेवानिवृत्त न्यायधीश एवं वरिष्ठ साहित्यकार  मुरलीधर वैष्णव को 'रचना रजत प्रतिभा सम्मान', चर्चित ब्लॉगर-साहित्यकार  आकांक्षा यादव को 'रचना प्रतिभा सम्मान' एवं  कवि व् समालोचक डॉ. रमाकांत शर्मा, मदन मोहन परिहार, हबीब कैफ़ी, हरिप्रकाश राठी, डॉ. पद्मजा शर्मा, डॉ. जेबा रशीद, पुष्पलता कश्यप, बसंत कुमार, भानु मित्र, अनिल अनवर, अक्षय गोजा, अर्जुन देव चारण, मनशाह नायक, दिनेश सिंदल, खुर्शीद खैराडी को  'शतकवीर सम्मान' से  सम्मानित किया गया।




आज ही के दिन शुरू हुआ था भारत में रेडियो प्रसारण

23 जुलाई को जब आप अपनी गाड़ी या घर में रेडियो सुनेंगे तो शायद आपको कुछ खास ना लगे पर ये दिन सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। 23 जुलाई को ही भारत में मुंबई से रेडियो प्रसारण की पहली स्‍वर लहरी गूंजी थी। 23 जुलाई को भारत में संगठित प्रसारण के 90 साल पूरे हो रहे हैं। प्रसारण की एक मोहक और ऐतिहासिक यात्रा में रेडियो ने सफलता के कई आयाम तय किए हैं। आज रेडियो भारतीय जनमानस के जीवन का एक अभिन्न अंग है। भारत में रेडियो से जुड़ी दो अनूठी बातें हैं, पहली तो यह कि यहां के रेडियो प्रसारण का नाम विश्व भर में विशिष्ट है ‘आकाशवाणी’ और उतनी ही अनूठी है इस ‘आकाशवाणी’ की ‘परिचय धुन’, जिसके साथ कुछ आकाशवाणी केंद्रों पर सभा सभा का आरंभ होता है हालांकि आकाशवाणी के बहुत सारे केंद्र अब अपना प्रसारण 24 घंटे करते हैं इसलिए वहां आकाशवाणी की संकेत ध्वनि सुनने नहीं मिल पाती है। ‘विविध भारती’ का प्रसारण 24 घंटे है तो वहां आकाशवाणी की संकेत धुन अब नहीं बज पाती।

यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि इस नायाब धुन को सन 1936 में ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी’ के संगीत विभाग के अधिकारी वॉल्टर कॉफमैन ने कंपोज़ किया था। ‘आकाशवाणी’ के इस अनूठे नाम की भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। वैसे अपने देश में सन 1924 के आसपास कुछ रेडियो क्लबों ने प्रसारण आरंभ किया था लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के चलते यह क्लब नहीं चल सके। आगे चलकर 23 जुलाई सन 1927 को मुंबई में ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी’ ने अपनी रेडियो प्रसारण सेवा शुरू की। 26 अगस्त 1927 को कोलकाता में नियमित प्रसारण शुरू हो गया। रेडियो प्रसारण का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने कहा था भारत वासियों के लिए प्रसारण का एक वरदान हो जायेगा। मनोरंजन और शिक्षा की दृष्टि से भारत में विद्यमान संभावना का हमें स्वागत करना होगा लेकिन 1930 तक आते-आते इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी दिवालिया हो गई और 1 अप्रैल 1930 को ब्रिटिश सरकार ने ‘इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस’ का गठन किया। मजे की बात यह है कि तब रेडियो श्रम मंत्रालय के अंतर्गत रखा गया। बात चल रही थी ‘आकाशवाणी’ के नामकरण की, तो बता दिया जाए कि दरअसल उन दिनों कई रियासतों में रेडियो स्टेशन खोले गए थे जिनमें मैसूर रियासत के 30 वॉट के ट्रांसमीटर से डॉक्टर एम वी गोपालस्वामी ने रेडियो प्रसारण शुरू किया और उसे नाम दिया ‘आकाशवाणी’। आगे चलकर सन 1936 से भारत के तमाम सरकारी रेडियो प्रसारण को ‘आकाशवाणी’ के नाम से जाना गया।

शुरू से ही रेडियो के तीन महान लक्ष्य थे- सूचना, शिक्षा और मनोरंजन। सामने थी भारत की भौगोलिक विभिन्नताओं और कठिनाइयों की चुनौती। लोगों को यह जानकर अचरज होगा कि सन 1930 से 1936 के बीच मुंबई और कोलकाता जैसे केंद्रों से हर रोज दो समाचार बुलेटिन प्रसारित किए जाते थे। एक अंग्रेजी में और दूसरा बुलेटिन हिंदुस्तानी में। 1 जनवरी 1936 को आकाशवाणी के दिल्‍ली केंद्र के उद्घाटन के साथ ही वहां से भी समाचार बुलेटिन प्रसारित होने लगे। सबसे खास बात यह है कि उन दिनों चूंकि समाचार बुलेटिन शुरू ही हुए थे इसलिए खबरें किसी एजेंसी से खरीदी नहीं जाती थी बल्कि समाचार वाचक उस दिन के समाचार पत्र लेकर मुख्य समाचार पढ़ दिया करते थे। लेकिन सन 1935 में सेंट्रल न्यूज़ आर्गेनाईजेशन यानी केंद्रीय समाचार संगठन की स्थापना के बाद समाचार बुलेटिनों का सुनियोजित ढंग से विकास हुआ। स्वतंत्रता के समय आकाशवाणी के कुल 18 ट्रांसमीटर थे। आकाशवाणी के नेटवर्क में कुल 6 रेडियो स्टेशन और पांच देसी रियासतों के रेडियो स्टेशन थे।

सन 1951 में रेडियो के विकास को पंचवर्षीय योजना में शामिल कर लिया गया उसके बाद से आकाशवाणी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आकाशवाणी ने समाज के हर तबके को अपने परिवार में शामिल किया है, चाहे ग्रामीण श्रोता हो, चाहे श्रमिक, कामकाजी महिलाएं हों या बुजुर्ग और बच्चे या युवा। सबके लिए आकाशवाणी के रोचक कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। आज देश की लगभग 98 प्रतिशत आबादी की पहुंच में है रेडियो।

21वीं सदी के इस तकनीकी युग में आकाशवाणी ने अपनी शक्ल बदली है। अब लोकल फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन यानी एफ एम केंद्रों का विस्तार हुआ है। और कार्यक्रमों की तकनीकी गुणवत्ता भी बढ़ी है। रेडियो आपके हाथ में है, आपके मोबाइल में है, इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया में इसकी पहुंच है। शुरुआती दौर से ही आकाशवाणी रचनात्मक पहल करती आ रही है। महत्‍वपूर्ण घटनाओं, समारोहों या खेलों की रेडियो कमेंट्री हो, रेडियो नाटक, रेडियो फीचर, फोन इन कार्यक्रम जैसी रचनात्मक विधाएं या फिर त्वरित प्रतिक्रिया वाले कार्यक्रम। sms का फरमाइशी कार्यक्रम हो या फिर शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम, साहित्यिक कृतियों के रेडियो रूपांतरण, गीतों भरी कहानियां, वार्ता, बाजार भाव, मौसम का हाल सब आकाशवाणी का हिस्‍सा हैं।

बदलते वक्‍त के साथ रेडियो ने अपनी नई विधाएं गढ़ी हैं। और इन्हें जनता के संस्कारों का हिस्सा बनाया है। 23 जुलाई 1969 को मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम रखा और उसी दिन आकाशवाणी दिल्ली से आरंभ हुआ ‘युववाणी’ कार्यक्रम। उद्देश्य था छात्र वर्ग और युवा पीढ़ी को प्रसारण का भागीदार बनाना। आगे चलकर इस युववाणी ने रंगमंच, अभिनय, संगीत और मीडिया के अनेक क्षेत्रों की बहुत प्रतिभाओं को निखारा। आकाशवाणी के अत्यंत महत्वपूर्ण योगदानों में शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत की अनमोल विरासत को सँजोना और लोकप्रिय करनास भी शामिल है। गुजरे जमाने के अनेक महत्वपूर्ण संगीतकार, शास्त्रीय संगीत के अनेक विद्वान, साहित्यकार और पत्रकार आकाशवाणी से जुड़े रहे हैं। आज भी आकाशवाणी के संग्रहालय में इनकी अनमोल रिकॉर्डिंग मौजूद है। महादेवी वर्मा जयशंकर प्रसाद, ‘निराला’, बच्‍चन जी, पं. रमानाथ अवस्थी वगैरह की अनमोल रचनाएं आकाशवाणी की लाइब्रेरी में मौजूद है। और अब तो प्रसार भारती ने सीडीज़ की शक्‍ल में इन्‍हें आपके लिए उपलब्‍ध भी करवा दिया है। इसे प्रसार भारती आर्काइव की वेबसाइट से खरीदा जा सकता है। इसमें वो रामचरित मानस गान भी शामिल है जो आपकी सुबहों का हिस्‍सा होती थी।

भारत में आकाशवाणी के लोकप्रियता का एक नया इतिहास तब रचा गया जब 3 अक्टूबर 1957 को ‘विविध भारती सेवा’ आरंभ हुई। ‘विविध भारती’ के फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम घर घर में गूंजने लगे। फिल्मी कलाकारों से मुलाकात, फौजी भाइयों के लिए ‘जयमाला’, ‘हवा महल’ के नाटक और अन्य अनेक कार्यक्रम जन-जीवन का हिस्सा बन गए। सन 1967 में विविध भारती से प्रायोजित कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। फिर तो रेडियो की लोकप्रियता शिखर पर पहुंच गई। अमीन सायानी की बिनाका गीतमाला आज भी हमारी यादों का हिस्‍सा है।

आकाशवाणी की ‘ध्वनि तरंगें’ सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी गूंजा करती है। वैसे अक्टूबर 1939 में पश्तो भाषा विदेश प्रसारण की शुरुआत हुई थी। विदेश प्रसारण सेवा आज 25 से भी अधिक भाषाओं में कार्यक्रम करती है। इसके अलावा आकाशवाणी की वेबसाइट पर लाइव स्‍ट्रीमिंग और मोबाइल एपलीकेशन के ज़रिए विविध भारती, एफ एम गोल्‍ड, रेनबो, समाचार सेवा, शास्‍त्रीय संगीत के चौबीस घंटे चलने वाले रेडियो चैनल ‘रागम’ और अलग अलग क्षेत्रीय भाषाओं के मनोरंजक कार्यक्रम सारी दुनिया में सुने जा सकते हैं।

जिन दिनों में छोटा पर्दा नहीं था तब रेडियो कमेंट्री विभिन्न घटनाओं को शब्दचित्र अपने श्रोताओं के लिए खींच देती थी चाहे आजादी की पूर्व संध्या पर पंडित नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ (नियति से साक्षात्कार) संसद में दिया था। आकाशवाणी के माध्यम से इसे पूरे राष्ट्र में सुना था। आज भी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रेडियो के ज़रिये अपनी ‘मन की बात’ लोगों तक पहुंचाते हैं। आज भारत में अनेक प्राइवेट एफ एम चैनल श्रोताओं का मनोरंजन करते हुए रेडियो की परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं।

आज आकाशवाणी प्रसारण के तीनों रुपों यानी शॉर्टवेव, मीडियम वेव और FM के जरिए देश-विदेश में उपलब्ध है। 90 साल पहले ध्वनि तरंगों ने भारत में एक नन्हा कदम रखा था और आज भारतीय प्रसारण ने एक परिपक्व उम्र को छुआ है। इस उम्र में भी सपनों के अंकुर हरे हैं। स्मृतियों के एल्बम भरे हैं। और तय करने को है एक लंबा सफर। प्रसारण के 90 बरस प्रसारकों और श्रोताओं के लिए उत्सव के क्षण हैं।

 ✍🏻 *ममता सिंह*
उदघोषिका विविध भारती, मुंबई

बुधवार, 5 जुलाई 2017

राजस्थान की बालिका वधू रूपा यादव अब बनेगी डॉक्टर

जब मन में लगन हो तो परिस्थितियाँ भी रास्ता दिखाने को मजबूर हो जाती हैं।  ऐसा ही हुआ राजस्थान की बालिका वधू रूपा यादव के साथ। जयपुर के करेरी गांव की रहने वाली रूपा यादव की कहानी दिलचस्प और प्रेरणादायक है। भारत में बाल विवाह पर कानूनी प्रतिबंध है, लेकिन राजस्थान समेत देश के कई अन्य राज्यों में आज भी बच्चों की शादी काफी कम उम्र में कर दी जाती है।  जब रूपा  महज आठ साल की थी और तीसरी कक्षा में पढ़ रही थी तभी उसकी शादी सातवीं में पढ़ने वाले शंकर लाल से कर दी गई। इतना ही नहीं उसी समारोह में उसकी बड़ी बहन की शादी शंकर के बड़े भाई से कर दी गई। 

जिस उम्र में रूपा को शादी का मतलब भी नहीं पता था, उस उम्र में वह शादी के बंधन में बंध गईं। जब वह दसवीं कक्षा में पहुंची तो उसका गौना हुआ। यानी वह  अपने माता-पिता का घर छोड़कर अपनी ससुराल आ गई। लेकिन रूपा की मेहनत और लगन ने अंतत: रंग दिखाया और 21 साल पूरा करने से पहले ही अब वह राजस्थान के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर बनने की पढ़ाई करेगी। 

सीबीएसई की ओर से आयोजित राष्ट्रीय प्रवेश-सह-पात्रता परीक्षा (NEET) की परीक्षा में रूपा ने सफलता हासिल की है। कोटा में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाली रूपा ने तीसरे प्रयास में इस सफलता को हासिल किया है।  रूपा बताती हैं कि कोटा में एक साल मेहनत करके मैं मेरे लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच गई।  एक साल तैयारी के बाद मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ।  अब आगे पढ़ने में फिर फीस की दिक्कत सामने आने लगी।  इस पर पारिवारिक हालात बताने पर संस्थान ने मेरी 75 प्रतिशत फीस माफ कर दी। अब वह डॉक्टरी की पढ़ाई कर समाज सेवा करने के साथ लड़कियों के लिए प्रेरणा बनना चाहती है। हालांकि इस बेटी को इस मुकाम तक पहुंचाने में उसके ससुराल वालों का भी बड़ा हाथ है।  ससुराल वालों ने मदद की तो रूपा ऐसा काम कर दिखाया है, जिसके बाद शायद दुनिया के कोई मां-बाप अपनी बेटी का बाल विवाह करने से पहले हजार बार सोचेंगे। 


रूपा का सफर आसान नहीं था। उसे और उसके परिवार को पिछड़ी मानसिकता के लोगों के खूब ताने सुनने पड़े थे । गांव के लोग रूपा के ससुराल वालों को कहते थे इसे पढ़ने के बजाय घर में रखो और रसोई का काम करवाओ। पढ़ाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा, लेकिन रूपा के पति को उसकी मेहनत और लगन पर पूरा भरोसा था। पति और ससुराल वालों ने देखा कि रूपा पढ़ने में मेधावी है, तो उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखे वे हरसंभव उसकी मदद करेंगे।  फिर पति व जीजा बाबूलाल ने रूपा का एडमिशन गांव से करीब 6 किलोमीटर दूर प्राइवेट स्कूल में कराया।  रूपा की सास अनपढ़ हैं, लेकिन किसी की परवाह न करते हुए उन्होंने भी अपनी बहू  को स्कूल जाने दिया जाए और पढ़ाई आगे जारी रखने दिया। 10वीं में रूपा ने  84 फीसदी अंक प्राप्त किए, तो हौसले में और भी वृद्धि हुई। 

रूपा के डॉक्टर बनने के पीछे भी एक दर्दनाक कहानी छुपी हुई है।  पढ़ाई के दौरान ही उसके चाचा भीमाराम यादव की हार्ट अटैक से मौत हो गई।  इसके बाद तो रूपा ने ठान लिया  कि वह डॉक्टर बनेगी, क्योंकि उन्हें समय पर उपचार नहीं मिल पाया था। लेकिन इसके लिए रूपा और उसके परिवार को काफी संघर्ष करना पड़ा। इस सफलता को हासिल करने के बाद रूपा कहती हैं, 'मेरे ससुराल वाले मेरे घरवालों की तरह छोटे किसान हैं, खेती से इतनी आमदनी नहीं हो पा रही थी कि वे मेरी उच्च शिक्षा का खर्च उठा सकें।  फिर मेरे पति ने टैक्सी चलानी शुरू और अपनी कमाई से मेरी पढ़ाई का खर्च जुटाने लगे। '

नारी सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण पेश करते हुये आज रूपा यादव उन तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा स्रोत के रूप में उभरी हैं, जो प्रतिभावान होते हुए भी चूल्हे-चौकी में अपना पूरा जीवन गँवा देती हैं। रूपा भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपने ससुराल पक्ष से पूरा सपोर्ट मिला और उसके बाद उनके जज्बे ने वो कर दिखाया की आज वह एक अद्भुत मिसाल बन गई हैं।